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कारसेवकों पर चली थी गोली, सत्ता के खेल की लगी थी बोली- The Story of Kothari Brothers

 तलवारों की धारो पर , इतिहास हमेशा बनता है

जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है..

Kothari Brother Ayodhya


लिखने वाला इस जोशीली शायरी में साफ नही करता कि जवानी के लिए कुर्बानी की राह,आखिर तय कौन और किसलिए करेगा।
आखिर वह इतिहास किसके नाम बनेगा, जिसके लिए जवानी को तलवार की धार पर चलना है। लेकिन ऐसे सवाल पूछना वीरों का धर्म नही होता।
तो बाइस और बीस की उम्र में राम और शरद ने यह सवाल पूछा भी नही।
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कलकत्ते के बड़ा बाजार में सेटल हो चुका यह एक मध्यवर्गीय, राजस्थानी मारवाड़ी परिवार था। दो माह बाद बहन की शादी थी। लेकिन राष्ट्र पुकार रहा था। बाप ने समझाया, मां ने आंसू बहाए।
मगर बचपन से ही शाखाओं में जो लोहा कूट कूट कर भरा गया था, वह जोर मार रहा था। तो देश के लिए कुछ कर जाने के जज्बे के सामने मां, पिता, बहन के सारे तर्क हार गए।
छोटे को बहन से बड़ा प्रेम था। उन्होंने वादा किया कि शादी की तिथि के पहले वे लौट आएंगे। पिता को वचन दिया कि रोज चिट्ठी लिखेंगे। विश्वास दिलाने के लिए सामान में दर्जन भर पोस्टकार्ड खरीदकर रखे। सहमे हुए परिवार को आश्वस्त कर राम और शरद कलकत्ता से निकल मोर्चे की ओर बढ़ चले।
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यह 22 अक्टूबर 1990 था। 23 को खबर आम हो गयी कि आडवाणी की रथयात्रा (Ram Rath Yatra) रोक दी गयी है। अब अयोध्या की ओर जाने के सारे रास्ते बंद थे। पुलिस लगी थी, गाड़ियां चेक की जा रही थीं।
बजरंग दल के दूसरे जोशीले साथियों के संग प्रशासन की नजरों से बचते हुए राम और शरद ने सौ किलोमीटर से ज्यादा दूरी पैदल तय की।
सरकार का दावा था, उस स्थान पर "परिंदा भी पर नही मार सकता" जहां अपना वीरोचित कर्म करने राम, शरद और हजारों युवा आये थे।
वहां पहुंचना तो था ही, कर्फ्यू तोड़कर लोग उस तरफ बढ़ चले,जहां आने और मंदिर बनाने का वादा रामलला को किया गया था। जोशीले राम और शरद को प्रत्यक्षदर्शियों ने मस्जिद के गुम्बद पर, गर्वोन्मत होकर भगवा झंडा लगाते देखा।
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Babri Masjid demolition
गुम्बद पर,भगवा झंडा लहराते कारसेवक
पोस्टमैन ने घण्टी बजायी!
फिर एक पोस्टकार्ड दरवाजे के नीचे सरका गया। पूर्णिमा ने उसे उठाया - लिखा था, मां-बाबा का ध्यान रखना। हम शादी के पहले पहुंच जाएंगे। सारी तैयारी वक्त पर कर ली जाएगी। चिंता की कोई बात नही है।
बहन देर तक फफकती रही। पूर्णिमा की शादी, जो 15 दिन पहले होने वाली थी, अब मुल्तवी हो चुकी थी। उसके भाइयों की अस्थियां और राख पूरे हिन्दुस्तान में घुमायी जा रही थी।
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What is the whole story behind the Karsevak Kothari brothers who died at Ayodhya
राम और शरद की बहन अपने दिवंगत भाइयों को निहारते हुए

पोस्टकार्ड दरअसल अयोध्या से दो माह पहले चला था। पोस्टकार्ड लिखे जाने के दूसरे दिन अयोध्या में गोलियां चली थी।
कोठारी भाइयों की लाशें, दूसरी दर्जन भर लाशों के साथ अयोध्या की अलग अलग गलियों में बरामद हुई थीं। जवान लाशों का कारवां यहां नही रुका।
कोठारी बंधुओं (Kothari Brothers) के अस्थि कलश से 125 सीटें निकली थीं। यह कम थी। इसके बाद 1992 में दोबारा कार सेवा हुई। अयोध्या (Ayodhya) में जमीन समतल की गई। पत्थर हटाये गए।
नो वन डिमोलिष्ड बाबरी(Babri Masjid) .. (जो बाद में कोर्ट ने बताया)
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मगर देश भर के पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। भारत युद्ध का मैदान बन गया। अपने ही देश मे, अपने ही लोगो से, हजार साल पहले मर खप चुके आक्रान्ताओं का हिसाब चुकाया जाने लगा।
दिसम्बर 92 से मध्य 93 तक देश के विभिन्न इलाकों में दंगे होते रहे।
बाबरी(Babri Masjid) गिरने की प्रतिक्रिया में मुस्लिम क्रिमिनल तत्वों की साजिश से, मुम्बई में बम ब्लास्ट हुए। इसकी प्रतिक्रिया में मुम्बई में फिर से भीषण दंगों का दौर चला। तीन हजार से ऊपर इंडियन्स मरे। अब सीटें 180 तक आ गईं थी। सरकार बन गयी, मगर लंगड़ी ही थी।
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तो 2002 में फिर कार सेवा आयोजित हुई। गोधरा से अहमदाबाद तक, तीन हजार हिंदुस्तानी और मरे। इस बार प्रयोग अलग था। आज तक क्रिया प्रतिक्रिया का खेल, व्यवस्था रोकती थी, दबाती थी।
अबकी बार वैकल्पिक मॉडल था, कि व्यवस्था खुद ही दंगाई थी।
भारत का समाज दो हिस्सों में बंट गया। एक दूसरे के भय में जीने लगा। क्रिया प्रतिक्रिया, अहर्निश मन वचन और कर्म में करने लगा। अब सीटें बहुमत से काफी ऊपर हैं।
इतिहास में,मंत्रालयों पर, शिला पट्टिकाओं में उनका नाम आ चुका है.. जिनके द्वारा थमाई तलवारों की धार पर राम और शरद चले थे। उनकी शहादत का मकसद पूरा हो चुका है।
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या शायद अभी भी पूरा नही हुआ। हिंदुस्तान एक दूसरे से भयभीत दो कबीलों में विभाजित है। दोनों ओर की जवानी, क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के साथ बेलगाम है।
परिवार, रोटी रोजी को पीछे छोड़, अशान्ति, बरबादी, गरीबी को हंसकर गले लगाता युवा, नशीली नफरत में डूबा है।
परपीड़ा राष्ट्रीय मनोरंजन है। अजब मंजर है।
क्या बाबरी की छत पर झण्डा फहरा कर, गर्व से दूर तक देखते हुए राम और शरद की उन जवान आंखों ने भारत का यह भविष्य देखा होगा??

-The LampPost

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